इक बात पर ज़मीं से अब दूर आसमाँ है
है पास वो मगर इक दीवार दरमियाँ है
मालूम है उसे भी ये राज़-ए-दिल हमारा
उस के बग़ैर सूना सारा मिरा जहाँ है
नाराज़गी नई है उल्फ़त की दास्ताँ में
आया नया कहानी में हिज्र का निशाँ है
क्या हाल-ए-दिल सुनायें, जाने के बाद उन के
बर्बाद है मुहब्बत, बर्बाद दास्ताँ है
बेज़ार एक दिल की ख़्वाहिश फ़क़त यही है
दिल का सुकूँ कहाँ है, ग़मख़्वार वो कहाँ है
जब से गयी मुहब्बत बेज़ार हो जहाँ से
ख़ामोश ज़िन्दगी है, ख़ामोश आशियाँ है
दीवार जागती है अब रात के पहर में
अब याद मे तुम्हारी जर्जर हुआ मकाँ है
#अमित_अब्र
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