अब तुम नहीं तुम्हारा बस ख़्वाब रह गया है
दिल एक इस जहाँ में बेताब रह गया है
तुम जो गये मकाँ से हो कर ख़फ़ा हमारे
दीवार पे उदासी, चुप बाब रह गया है
यादों भरी तुम्हारी शमशीर चीरती है
दिल बे-लहू तो आँखों में आब रह गया है
तामीर तो हुआ पर जाने के बाद तेरे
बेज़ार सो मकाँ का हर ख़्वाब रह गया है
मानिन्द-ए-मौज था मैं जब पास था तुम्हारे
जो दूर हूँ तो मुझ में गिर्दाब रह गया है
तुम तो चले गये हो सब छोड़ कर के लेकिन
यादों का एक मुझ में सैलाब रह गया है
नफ़रत भरी फ़ज़ा में ये बात सोचता हूँ
दिल का चमन कोई क्या शादाब रह गया है
बाक़ी नहीं मरासिम जब कोई साथ उस के
क्यूँ दर्द एक दिल में नायाब रह गया है
बे-नूर ज़िन्दगी है तेरे बिना मुहब्बत
बे-रंग मेरे दिल का सुर्ख़ाब रह गया है
चुप-चाप बुझ रहा हूँ मैं याद में तुम्हारी
दिल में भी अब न वो आब-ओ-ताब रह गया है
#अमित_अब्र
06-07-2017
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