फ़लक पे वो अपना असर कर गया
मिरी शाम को वो सहर कर गया
जहाँ के सितम से न वो टूटकर
मुहब्बत मिरी मो'तबर कर गया
हुआ इश्क़ रुख़सत जो घर से मिरे
मकाँ को मिरे खंडहर कर गया
बयाँ कर रही थी नज़र आरज़ू
कहा कुछ नहीं पर ख़बर कर गया
मिली जो उसे ज़ीस्त मेरे बिना
मिरी मौत मैं कार-गर कर गया
#अमित_अब्र
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