तिरी याद मुझ को सताती रही
मुझे चाँदनी भी जलाती रही
तुझे भूल जाये इसी आस में
नज़र ख़्वाब तेरे भुलाती रही
बयाबाँ हुआ इश्क़ जब यार बिन
बयाबानी दिल में समाती रही
दिल अपना ही दुश्मन हुआ इश्क़ में
गया यार तो जान जाती रही
थी ख़्वाबों की कोशिश हँसाने की पर
हक़ीक़त हमेशा रुलाती रही
#अमित_अब्र
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