दिलों से दिलों को मिलाने चला
अलम इस जहाँ के मिटाने चला
मुहब्बत जो ठहरी इबादत तो मैं
ख़ुदाओं को सारे मनाने चला
गुल-ए-इश्क़ से जो ज़मीं भर गई
उफ़ुक पे गुलिस्ताँ खिलाने चला
लिये फिर रहा है जो काँटे यहाँ
उसे राह-ए-गुलशन दिखाने चला
मिरे ख़ूँ का प्यासा फ़साना हुआ
मैं किरदार अपना मिटाने चला
#अमित_अब्र
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