Tuesday, 21 December 2021

मुहब्बत के मरासिम से फ़ज़ा में रौशनाई है

मुहब्बत के मरासिम से फ़ज़ा में रौशनाई है
मुहब्बत के मरासिम से हँसी भी मुस्कुराई है


मुहब्बत के मरासिम को कभी बे-जान मत करना 
इसी के ही बदौलत इस जहाँ में जान आई है


ज़माना आज भी है इश्क़ के मक़्दूर से ग़ाफ़िल
मुहब्बत ने हमेशा जीत हर मुश्किल पे पाई है


शहीदान-ए-मुहब्बत गर तुम्हारे रहनुमा हैं तो
यकीं मानो तुम्हारे साथ दुनिया है ख़ुदाई है


अदावत भूलकर देखो किसी शायर की नज़रों से 

ग़ज़ल है ज़िन्दगी यारों मुहब्बत की रुबाई है


मुक़ाबिल में हमारे है हमारी ही मुहब्बत जो
हराना हार है तो जीत जाना बे-वफ़ाई है


हक़ीक़त में मुहब्बत भी बयानी है बराबर की

कहीं बादल कहीं पे ख़ुद ज़मीं बादल पे छाई है


#अमित_अब्र

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