मैं तूफ़ान-ए-दरिया से ग़ाफ़िल न था
मयस्सर मगर मुझ को साहिल न था
शनासा बहुत थे मगर भीड़ में
मिरे हाथ को हाथ हासिल न था
सफ़र ज़िन्दगी का तो आसान था
सफ़र के मगर मैं ही क़ाबिल न था
जिसे तुम ने माना गुनहगार है
वो मजबूर था मेरा क़ातिल न था
मुझे क़त्ल इस ज़िन्दगी ने किया
मेरी मौत में कोई शामिल न था
#अमित_अब्र
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