मिरी नब्ज़ यूँ याँ दुखाई गई
ग़ज़ल मुझ से मेरी न गाई गई
न था मुंतज़िर कोई जिस पे मिरा
वही राह मुझ को दिखाई गई
बदन ताजिरी में सजा कर यहाँ
मिरी रूह हर पल सताई गई
सफ़र रात का फिर न आगे बढ़ा
क़दम-दर-क़दम लौ बुझाई गई
बहर रेत का ये नहीं और कुछ
ज़मीं धूप में जो जलाई गई
#अमित_अब्र
28-09-2016
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