Wednesday, 15 December 2021

मिरी नब्ज़ यूँ याँ दुखाई गई

मिरी नब्ज़ यूँ याँ दुखाई गई 
ग़ज़ल मुझ से मेरी न गाई गई

न था मुंतज़िर कोई जिस पे मिरा     
वही राह मुझ को दिखाई गई

बदन ताजिरी में सजा कर यहाँ 
मिरी रूह हर पल सताई गई

सफ़र रात का फिर न आगे बढ़ा
क़दम-दर-क़दम लौ बुझाई गई

बहर रेत का ये नहीं और कुछ
ज़मीं धूप में जो जलाई गई

#अमित_अब्र 
28-09-2016

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