है रस्म-ओ-रिवायात का कोहराम ज़ियादा
माज़ी पे धरे जाते हैं इल्ज़ाम ज़ियादा
सब मुफ़्लिस-ओ-मज़लूम तिरे दर पे हैं या-रब
है दर पे तिरे दाख़िले का दाम ज़ियादा
दिन भर तो गुज़रता है वज़ा-दार ही मेरा
आज़ुर्दा-सी लगती है मुझे शाम ज़ियादा
जो छोड़ गया मुझ को उसी माह-जबीं से
चर्चे में है मेरा दिल-ए-नाकाम ज़ियादा
शर्मिन्दा है हर शख़्स रह-ए-शौक़ में क्यूँकर
क्यूँ नाम मुहब्बत का है बदनाम ज़ियादा
-अमित सिंह
26-08-2018(14-12-2022)
लाजवाब ग़ज़ल साझा की है ...
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया
बहुत-बहुत शुक्रिया आपका मोहतरम🙏🌷
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