Tuesday, 21 December 2021

है रस्म-ओ-रिवायात का कोहराम ज़ियादा

है रस्म-ओ-रिवायात का कोहराम ज़ियादा
माज़ी पे धरे जाते हैं इल्ज़ाम ज़ियादा

सब मुफ़्लिस-ओ-मज़लूम तिरे दर पे हैं या-रब 
है दर पे तिरे दाख़िले का दाम ज़ियादा

दिन भर तो गुज़रता है वज़ा-दार ही मेरा 
आज़ुर्दा-सी लगती है मुझे शाम ज़ियादा

जो छोड़ गया मुझ को उसी माह-जबीं से
चर्चे में है मेरा दिल-ए-नाकाम ज़ियादा

शर्मिन्दा है हर शख़्स रह-ए-शौक़ में क्यूँकर 
क्यूँ नाम मुहब्बत का है बदनाम ज़ियादा

-अमित सिंह 
26-08-2018(14-12-2022)

3 comments:

  1. लाजवाब ग़ज़ल साझा की है ...
    बहुत शुक्रिया

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    1. बहुत-बहुत शुक्रिया आपका मोहतरम🙏🌷

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