शमशीर-ए-सितमगर दर-ए-मुफ़्लिस पे चली है
इक आह मुसलसल दिल-ए-मुफ़्लिस से उठी है
फ़रमान-ए-हुकूमत है तबाही लिए फिर भी
ख़ामोश हुए लब हैं सदा दिल में दबी है
जो आज रही तेग़ बड़ी तेज़ फ़लक पर
सो आज ज़मीं पे ही ज़मीं लाल जमी है
क्या बात उठी थी दिल-ए-मुज़तर के जिगर में
जो तेज़ कभी थी वो नज़र आज झुकी है
गुज़रा न समंदर दर-ए-सहरा से कभी जो
ख़ामोश शजर और ज़मीं रेत हुई है
जो ज़ीस्त करे आज सफ़र शह्र-ए-ख़िज़ाँ में
है रूह बयाबाँ शब-ए-ग़म संग चली है
क्या हाल बताएं दिल-ए-मा'ज़ूर तुझे हम
दिन छोड़ गया हिस्से तिरे रात बची है
है हाल-ए-मकाँ गुज़रे हुए वक़्त का किस्सा
खिलते थे जहाँ फूल वहाँ क़ब्र बनी है
#अमित_अब्र
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