हुई मह से जब आशनाई मिरी
हुई फिर न शब से रिहाई मिरी
नुमायाँ था वो पर न मिलना हुआ
कि उस तक नहीं थी रसाई मिरी
अभी था जला मैं अभी बुझ गया
अभी थी ज़ेहन में वो आई मिरी
जहाँ में जो बदनाम-ए-उल्फ़त हुए
तो तस्वीर उस ने जलाई मिरी
मिटाया जहाँ ने मुझे कि उसे
न भायी थी दिल की लगाई मिरी
सदाक़त कहा तो मिटाये गये
सज़ा बन गई लब-कुशाई मिरी
जहाँ में सदाक़त की जो बात की
हँसी बातिलों ने उड़ाई मिरी
#अमित_अब्र
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