ग़म-ए-हिज्र में रात सारी रही
शब-ए-ग़म की हर शाम भारी रही
मरासिम अगरचे न उस से रहा
मगर घर में इक सोगवारी रही
मुसव्विर रहा जो क़फ़स में कहीं
अधूरी ही तस्वीर प्यारी रही
मुसाफ़िर नहीं जो रहा साथ में
सफ़र में उसी की शुमारी रही
मुआविन जो मेरा कहीं और था
मुझे हार मिलती क़रारी रही
कहीं धूप में दिन जलाया गया
कहीं सर्द से रात हारी रही
कभी भी नहीं वो दिखाई दिया
कहानी सराबी हमारी रही
#अमित_अब्र
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