बयाबाँ वो दिल का शहर कर गया
मुझे सूखता इक शजर कर गया
अभी तक रहा जो मिरे ख़्वाब में
वो इक दर्द मेरे जिगर कर गया
मिला तो नहीं वो मगर देख कर
जहाँ से मुझे बे-ख़बर कर गया
चला साथ जो काफ़िला याद का
चला भी नहीं और सफ़र कर गया
न टूटी मुहब्बत शब-ओ-रोज़ की
दिया रात पे यूँ असर कर गया
#अमित_अब्र
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