निगाहों से अपनी रिहाई न दे
मुझे तू ग़म-ए-आशनाई न दे
बिखर जाऊँगा राह में हिज्र की
ख़ुदा इश्क़ में तू जुदाई न दे
ज़माना जो कर दे जुदा यार से
इलाही हमें वो ख़ुदाई न दे
अँधेरा लिए जो यहाँ फिर रहा
उसे राह कोई दिखाई न दे
दो आवाज़ ऐसी नई ज़ीस्त को
सदा मौत की फिर सुनाई न दे
#अमित_अब्र
No comments:
Post a Comment