चीख रही है मानवता, मानव सारे मौन हुए
हे नृप ! बतलाओ मानवता के क़ातिल आख़िर कौन हुए
बाँध सब्र का टूट रहा, अब रणभेरी इक गूँजेगी
राम नहीं अब सीता ही रावण को ज़िन्दा फूँकेगी
द्रुपद दुलारी माधव को, कब तक आवाज़ लगायेगी
बहुत हुआ अब खुद ही वो, कौरव का वंश मिटायेगी
भारत की ऐ वीर नारियों, आगे बढ़कर हुंकार भरो
छोड़ो नर से आस न्याय की, स्वयं अपना उद्धार करो
टूट पड़ो काले गोरों पर, बन कर तुम लक्ष्मीबाई
कलयुग के रक्तबीज को, काटो बन कर काली माई
धरती जिस दिन फुंफकारेगी, आसमान थर्रायेगा
दिग्गज सारे डोलेंगे, जब शीशा पत्थर से टकरायेगा
देर हुई इंसाफ़ में तो फिर रक्तपात ऐसा होगा
धरती होगी सनी लहू में, चेहरों पर लाल लिखा होगा
-डा.अमित कुमार सिंह 'अब्र'
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