जहाँ में मुहब्बत पनपती रही
मिरे दर से लेकिन मुकरती रही
तिरी याद में हम बिखरते रहे
ख़ुदाई मगर ये सवँरती रही
ग़म-ए-हिज्र में लब तो हँसते रहे
जुदाई प’ जी में सिसकती रही
थे दिन जो मिलन के महकते रहे
मगर हिज्र की शब सुलगती रही
नहीं 'अब्र' की आस शायद उसे
ज़मीं प्यास में जो झुलसती रही
#अमित_अब्र
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