मुहब्बत का हसीं और संदली अंदाज़ है वो
महकती सी मेरी इस ज़िन्दगी का राज़ है वो
है उस के नाम का हर हर्फ़ मेरे नाम में अब
किताब-ए-ज़ीस्त पे लिक्खा हसीं अल्फ़ाज़ है वो
इबादत है मुहब्बत है मुहब्बत का बयाँ है
जहाँ में इश्क़ के अब इश्क़ का आग़ाज़ है वो
है मुबहम शक्ल उस की होंट भी ख़ामोश लेकिन
ज़माने में मुहब्बत की बुलंद आवाज़ है वो
मुहब्बत का फ़लक ज़द में है दिलबर की ब-दौलत
कि मेरे इश्क़ के शाहीन की परवाज़ है वो
नज़र जिस पे पड़ी उस की वो ग़म से दूर है अब
कि इशरत के जहाँ में इक बड़ा एज़ाज़ है वो
घटा ज़ुल्फ़ें तो झील आँखें गुलाबों जैसे आरिज़
हया ज़ेवर अदा क़ातिल निगाह-ए-नाज़ है वो
ज़माना थम सा जाता है उसे सुनता वो जब है
सदा उस की न हो मानो सुरीला साज़ है वो
ज़माने को नुमायाँ हूँ मगर महफ़ूज हूँ मैं
कि जिस पे राज़ है मेरा मिरा हमराज़ है वो
#अमित_अब्र
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