जिस की ख़ुशी की ख़ातिर दुनिया से मैं लड़ा हूँ
है साथ वो नहीं तो ख़ुद आप से जुदा हूँ
रूदाद-ए-इश्क़ में है किरदार मेरा उलझा
उलझी हुई मुहब्बत का एक माजरा हूँ
जब से हुआ वो रुख़सत बिखरा मिरा जहाँ है
टूटे हुए मकाँ का टूटा हुआ ख़ुदा हूँ
दरिया-ए-दर्द-ए-दुनिया से क्या गिला करूँ जब
महबूब से बिछड़ कर ख़ुद दर्द हो चुका हूँ
जाना यहाँ से उस का इस बात का सबब है
कल तक बयान-ए-महफ़िल था आज गुमशुदा हूँ
ताबीर एक वो था हर ख़्वाब की हमारे
है वो नहीं यहाँ तो हर ख़्वाब से ख़फ़ा हूँ
जो साथ अब सफ़र में वो हमसफ़र नहीं है
है साथ कारवाँ पर तन्हा ही मैं चला हूँ
उड़ कर पहुँच रही है जो ख़ाक उस के दर तक
रब की मेहर कि मैं भी उस ख़ाक में मिला हूँ
तारीक देख मेरी तारीख़ बन गया है
मैं बाद रौशनी के ज़िन्दा यहाँ रहा हूँ
#अमित_अब्र
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