मिला वो मुझे यूँ कि फिर न मिला
रहा उम्र भर फिर इसी का गिला
नहीं इश्क़ जब साथ मेरे चला
चला साथ इक दर्द का काफ़िला
शब-ए-वस्ल मुझ को न मुमकिन हुई
शब-ए-हिज्र का बस रहा सिलसिला
हुआ यार ख़ुर्शीद जब रेत का
नहीं रेत में गुल कभी फिर खिला
मिली थी मुझे राह में रौशनी
मगर साथ तारीक मेरे चला
#अमित_अब्र
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