सूरज को देख सहरा ग़मगीन हो रहा है
बेबस पे जुर्म बेहद संगीन हो रहा है
बारूद बन के बादल छाया है आस्माँ में
सैयाद बिन ही घायल शाहीन हो रहा है
है तेग़ किस के हाथों शह-रग कटी है किस की
किस के लहू से मंज़र रंगीन हो रहा है
ख़ामोश क्यूँ है दुनिया ज़ालिम के हर सितम पे
इंसान क्या बला का शौक़ीन हो रहा है
इंसानियत पे हँस कर बेबस को कर के बेबस
इंसान आज अपनी तौहीन हो रहा है
इंसानियत पशेमाँ लाचार क़ायदे हैं
फ़ित्नों से ख़ाक सारा आईन हो रहा है
माहौल काफ़िराना और झूट की इबादत
दुनिया में आज अफ़सुर्दा दीन हो रहा है
#अमित_अब्र
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