Thursday, 23 December 2021

सूरज को देख सहरा ग़मगीन हो रहा है

सूरज को देख सहरा ग़मगीन हो रहा है
बेबस पे जुर्म बेहद संगीन हो रहा है


बारूद बन के बादल छाया है आस्माँ में
सैयाद बिन ही घायल शाहीन हो रहा है


है तेग़ किस के हाथों शह-रग कटी है किस की
किस के लहू से मंज़र रंगीन हो रहा है


ख़ामोश क्यूँ है दुनिया ज़ालिम के हर सितम पे
इंसान क्या बला का शौक़ीन हो रहा है


इंसानियत पे हँस कर बेबस को कर के बेबस
इंसान आज अपनी तौहीन हो रहा है


इंसानियत पशेमाँ लाचार क़ायदे हैं
फ़ित्नों से ख़ाक सारा आईन हो रहा है


माहौल काफ़िराना और झूट की इबादत 
दुनिया में आज अफ़सुर्दा दीन हो रहा है


#अमित_अब्र

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