Tuesday, 21 December 2021

कही थी कभी जो कहानी जली

कही थी कभी जो कहानी जली
मेरे साथ मेरी निशानी जली


किसी की दुआ ने सलामत रखा
किसी आह में ज़िन्दगानी जली


ग़ज़ल थी ज़मीं पे मगर आदतन
बहर में नदी की रवानी जली


सँवरकर यहाँ रात की धूप में
किसी के लिये रात-रानी जली


मुहब्बत की ख़ातिर दीवाना जला        
मुहब्बत की ख़ातिर दीवानी जली


उठा था धुँआ आज ख़ुश्बू भरा
कहीं थी कली ज़ाफ़रानी जली


सताये हुए शख़्स की आह में
बदी की सदा हुक्मरानी जली


नया इक शहर जो बसाया गया
बसी एक बस्ती पुरानी जली


न जी से मेरे वो भुलाया गया
जवानी जली, ज़िन्दगानी जली


#अमित_अब्र

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