कही थी कभी जो कहानी जली
मेरे साथ मेरी निशानी जली
किसी की दुआ ने सलामत रखा
किसी आह में ज़िन्दगानी जली
ग़ज़ल थी ज़मीं पे मगर आदतन
बहर में नदी की रवानी जली
सँवरकर यहाँ रात की धूप में
किसी के लिये रात-रानी जली
मुहब्बत की ख़ातिर दीवाना जला
मुहब्बत की ख़ातिर दीवानी जली
उठा था धुँआ आज ख़ुश्बू भरा
कहीं थी कली ज़ाफ़रानी जली
सताये हुए शख़्स की आह में
बदी की सदा हुक्मरानी जली
नया इक शहर जो बसाया गया
बसी एक बस्ती पुरानी जली
न जी से मेरे वो भुलाया गया
जवानी जली, ज़िन्दगानी जली
#अमित_अब्र
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