नमी का किन आँखों में आना हुआ
किसी के लिए कब ज़माना हुआ
ज़रूरी नही तुम जहाँ के लिए
तुम्हारा फ़साना पुराना हुआ
मुकम्मल ज़मीं अब हुई रेत सी
यहाँ संग का आशियाना हुआ
शहर अब ज़ियादा ज़रूरी हुए
नया गाँव भी क़ैदखाना हुआ
शजर अब हुए हैं यहाँ बे-समर
परिंदों, तुम्हारा ठिकाना हुआ
#अमित_अब्र
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