भरी भीड़ के दरमियाँ से गया
हुआ इश्क़ जो मैं यहाँ से गया
ज़मीं क्या फ़लक क्या शब-ओ-रोज़ क्या
मुहब्बत में मैं इस जहाँ से गया
वो आये मेरी दास्ताँ में तो मैं
ज़माने की हर दास्ताँ से गया
मुहब्बत को करने मैं साबित यहाँ
मुहब्बत के हर इम्तिहाँ से गया
थे पहरे बहुत राह-ए-गुलशन में पर
दर-ए-गुल मैं बच बाग़बाँ से गया
मुहब्बत में जो थे निशाँ मौत के
गुज़र मैं हर इक उस निशाँ से गया
तलाश-ए-मुहब्बत में मैं यार की
ज़मीं आस्माँ कहकशाँ से गया
सनम साथ था जंग-ए-उल्फ़त में सो
जहाँ हार मुझ ना-तवाँ से गया
शजर बे-समर तो फ़लक आतिशी
परिन्दे का मन आशियाँ से गया
उदासी में दिल भी शब-ओ-रोज़ भी
सनम जब से मेरे मकाँ से गया
गुज़र इस जहाँ में हर इक आदमी
गुज़र हर यक़ीन-ओ-गुमाँ से गया
हुआ क़त्ल मैं प्यार में यार के
मुहब्बत में मैं अपनी जाँ से गया
हुई इंतिहा जो फ़िराक-ए-सनम
गई जान जी हर फ़ुग़ाँ से गया
#अमित_अब्र
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