ज़िन्दगी कभी हँसकर मेरे घर नहीं आती
ज़िन्दा तो हूँ पर मुझ में जाँ नज़र नहीं आती
चाँद तो वही मेरे बाम रोज़ आता है
रौशनी वही लेकिन मेरे दर नहीं आती
फ़र्क याँ नहीं शायद मौत से हमारी जो
ये ख़बर कभी बनकर इक ख़बर नहीं आती
भीड़ से शनासाई है मगर न जाने क्यूँ
याँ नज़र कोई सूरत मो'तबर नहीं आती
रात ही सफ़र करती बस्तियों में हर दम क्यूँ
क्यूँ कभी दर-ए-बस्ती तक सहर नहीं आती
#अमित_अब्र
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