मगर पूरा जला नहीं पाती
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ख़्वाहिश-ए-रिज़्क़ में उठती है
इक आग पेट में
जिस में
जलता है जिस्म
जलता है ख़ूँ
और
जलती है रग-ए-जाँ
ये आग
जलाती तो है मुझे
मगर पूरा जला नहीं पाती
ज़िन्दगी है इक सफ़र सहरा का
इस सफ़र की राह में है
जलता सूरज
जलती ज़मीं
जलता आसमाँ
और
जलती रेत है
ज़िन्दगी अपने इस सफ़र में
जलाती तो है मुझे
मगर पूरा जला नहीं पाती
आग में ज़माने की
जल रहीं हैं ख़्वाहिशें
जल रही है चाहत उम्मीद
ख़्वाब और तक़दीर
जल रहा है हर शख़्स इस में
लेकिन
शायद सब्ज़ सा कुछ अभी बाक़ी है मुझ में
क्यूँकि
ज़माने की आग
जलाती तो है मुझे
मगर पूरा जला नहीं पाती
#अमित_अब्र
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