Wednesday, 15 December 2021

बिखरने पे गुल के चमन रो रहा है

बिखरने पे गुल के चमन रो रहा है

हमें देख लड़ते वतन रो रहा है 

फ़ना हो रहे जिस्म बारूद में अब
लिपटकर बदन से बदन रो रहा है


चला शब्दबेधी वजह के बिना जो
कहीं आज फिर इक श्रवन रो रहा है


निकलता नहीं चश्म से आब लेकिन
बयाबाँ वतन देख मन रो रहा है


अभी तक रहा जो दुखी ये हिमालय
धरा रो रही है भुवन रो रहा है 


-डॉ. अमित कुमार सिंह 'अब्र'

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