बिखरने पे गुल के चमन रो रहा है
हमें देख लड़ते वतन रो रहा है
फ़ना हो रहे जिस्म बारूद में अब
लिपटकर बदन से बदन रो रहा है
चला शब्दबेधी वजह के बिना जो
कहीं आज फिर इक श्रवन रो रहा है
निकलता नहीं चश्म से आब लेकिन
बयाबाँ वतन देख मन रो रहा है
अभी तक रहा जो दुखी ये हिमालय
धरा रो रही है भुवन रो रहा है
-डॉ. अमित कुमार सिंह 'अब्र'
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