यहाँ सबके बताओ कब हुए अरमान पूरे हैं
किसी की रात रौशन है किसी के दिन अँधेरे हैं
बुझा देती है अक्सर रात सूरज को ख़ुमारी में
नहीं हर शाम की तक़दीर में होते सवेरे हैं
न हो आग़ाज़ गर अच्छा न हो अंजाम गर अच्छा
सियासी हुक्मराँ भी फिर न तेरे हैं न मेरे हैं
बताओ तुम तुम्हारे सी कहाँ क़िस्मत हमारी है
तुम्हारे ख़्वाब पूरे हैं हमारे ख़्वाब अधूरे हैं
मुहब्बत जल रही है आज नफ़रत के शरारों से
मुहब्बत के फ़लक पे आग के बादल घनेरे हैं
#अमित_अब्र
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