इक दौर-ए-कर्ब में अब सारा मिरा जहाँ है
बिन यार जल रही शब दिन भी धुआँ धुआँ है
दर-दर भटक रहा हूँ मैं फ़िक्र में सनम की
मेरे ख़ुदा बता मेरी ज़िन्दगी कहाँ है
ज़ुल्म-ओ-सितम जहाँ का उसके नहीं मुक़ाबिल
नाला-ए-हिज्र में जो ग़म एक अब निहाँ है
है दूर यार जो तो बेहाल हाल-ए-दिल क्यूँ
क्यूँ चश्म तर-ब-तर और वीराँ हुआ मकाँ है
दिलबर नहीं रहा जो अब मुंतज़िर मिरा तो
ईजाद मेरे दिल पर इक ज़ख्म का निशाँ है
वादा-ए-वस्ल है सो ज़िन्दा यहाँ हूँ वर्ना
ये ज़ीस्त मौत की बस इक और तर्जुमाँ है
ज़ख़्मी हुआ हूँ मैं ख़ुद अपने फ़साद-ए-दिल से
ख़ातिर सनम की देखो मुश्किल में मेरी जाँ है
क़तरा-ए-इश्क़ की है इक आरज़ू जिगर में
शम्स-ओ-क़मर नहीं ना ख़्वाहिश में आसमाँ है
चैन-ओ-क़रार क्या क्या मसरूफ़ियत जहाँ की
जो पास तुम नहीं तो ये ज़ीस्त रायगाँ है
है यार जो हमारा अब दूर काफ़िले से
ठहरा हुआ सफ़र है ग़मगीन कारवाँ है
आग़ाज़-ए-ज़िन्दगी से अंजाम-ए-ज़िन्दगी तक
कुछ और क्या सफ़र में बस दर्द दरमियाँ है
#अमित_अब्र
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