उल्फ़त में परेशाँ दिल-ए-नादान हुआ है
महबूब मिरा मुझ से ही अंजान हुआ है
बर्बाद मुझे कर के अगर शाद हो तुम तो
रंज-ओ-ग़म-ए-उल्फ़त मिरा आसान हुआ है
वो दूर सही मेरे ख़यालों में ही गुम है
ऐसे भी सनम मुझ पे मेहरबान हुआ है
सरसब्ज़ थी इस दिल की ज़मीं आप के दम से
उपवन ये बिना आप के वीरान हुआ है
हम कर न सके रंज बयॉं नज़्म-ओ-ग़ज़ल में
दर्द-ए-दिल-ए-नाकाम ही दीवान हुआ है
-अमित सिंह
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