Thursday, 6 January 2022

ख़फ़ा इश्क़ से अब ज़माना हुआ

ख़फ़ा इश्क़ से अब ज़माना हुआ

न अब क़ैस कोई दीवाना हुआ


ग़ज़ल दास्तान-ए-सियासत हुई

कभी थी इबादत फ़साना हुआ


दर-ए-इश्क़ है दर इबादत का पर

किसी का वहाँ अब न जाना हुआ


मुहब्बत के अब हैं तरीक़े नये

पुराना तरीक़ा पुराना हुआ


हुआ जो जुदा मैं तिरे प्यार से

मिरा जी ग़मों का ठिकाना हुआ


मिले तो बहुत याँ मगर बाद तेरे

किसी पे न दिल का फिर आना हुआ


मुहब्बत में जो ग़म मिला था मुझे 

कभी वो न जी से रवाना हुआ


हुआ बाद तेरे यहाँ ये सितम

था आबाद दिल जो वीराना हुआ


उजाड़ा फ़सादों ने घर यूँ मिरा

की फिर घर न मुझ से बनाना हुआ 


सितमगर हुआ आज सय्याद जो

भला इक परिन्दा निशाना हुआ 


मुहब्बत तुम्हारी न मुझ को मिली

सो मैं आप से भी बेगाना हुआ


#अमित_अब्र

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