Friday, 7 January 2022

अब इश्क़ हुआ नफ़रतों के ज़ेर-ए-नगीं है

अब इश्क़ हुआ नफ़रतों के ज़ेर-ए-नगीं है

लगता है मुहब्बत का शजर ज़ेर-ए-ज़मीं है


नाराज़ सा लगता है ख़ुदा यार-ओ-सनम से

जो अर्श-नशीं था वही अब ख़ाक-नशीं है


हैं राह-ए-मुहब्बत में अँधेरे ही अँधेरे

बे-नूर हुआ इश्क़ सियह माह-जबीं है


बेज़ार हुआ इश्क़ सलीक़ा-ए-जहाँ से

बस फ़िक्र-ए-मुहब्बत है कहीं ज़िक्र नहीं है


मजबूर मुहब्बत सर-ए-बाज़ार लुटेगी

ग़मगीन फ़लक और पशेमान ज़मीं है


कहने को हुए दूर तिरे दर से सनम हम

बस जिस्म हुआ दूर मगर रूह वहीं है


मंज़ूर नहीं आज उसे बात हमारी 

कहता था कभी जो कि फ़क़त तुम पे यक़ीं है


अब और कहाँ ढूँढ़ रहीं तेरी निगाहें 

तेरा दिल-ए-बिस्मिल दिल-ए-मजरूह यहीं है


क्यूँ ज़िक्र-ए-मुहब्बत नहीं हम से कभी करते  

आईन-ए-मकाँ है या कोई ख़ौफ़-ए-मकीं है


क्या राज़-ए-वफ़ा याद तुझे आज दिलायें 

जब राज़-ए-वफ़ा यार तुझे याद नहीं है


जब से है हुआ यार मिरा दूर नज़र से 

ये जी है कहीं और ज़ेहन और कहीं है


इस इश्क़ से है इश्क़ हमें हद से ज़ियादा

ये इश्क़ ज़माने की हर इक शय से हसीं है 


-अमित सिंह

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