दर-ए-ग़म पे वीरानियाँ चाहता हूँ
मैं ख़ुशियों भरा आशियाँ चाहता हूँ
उसे जीत जाऊँ मैं जिन बाज़ियों में
ख़ुदा मैं वही बाज़ियाँ चाहता हूँ
परेशान हो तुम जहाँ से तो तुम से
तुम्हारी परेशानियाँ चाहता हूँ
कहानी भरेगी दिलों में उदासी
नहीं ज़िक्र-ए-दुश्वारियाँ चाहता हूँ
हो आसान जिस से सफ़र इश्क़ का फिर
वही आज आसानियाँ चाहता हूँ
ख़ुदा हो न पर हो मिसाल-ए-सदाकत
फ़क़त एक ऐसा मियाँ चाहता हूँ
मिले दर से दर और दिल से मिले दिल
न दीवार मैं दरमियाँ चाहता हूँ
चले ज़िन्दगी कुछ हसद के बिना भी
दिलों में न अब दूरियाँ चाहता हूँ
हो जिस हाल में मौत मंज़ूर, ऐसी
जहाँ में न मजबूरियाँ चाहता हूँ
सदा ही रही मेरी बे-रंग दुनिया
मैं इक दौर-ए-रंगीनियाँ चाहता हूँ
अदावत भरे इस जहाँ में इलाही
मुहब्बत की सरगोशियाँ चाहता हूँ
#अमित_अब्र
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