ज़िन्दगी इक सवाल मुश्किल है
दर्द की देख-भाल मुश्किल है
फिर से महबूब लौट आयेगा
फिर से होगा कमाल मुश्किल है
इश्क़ ग़मगीन है कि अब इस में
हिज्र आसाँ विसाल मुश्किल है
हो गया दिल असीर-ए-उल्फ़त तो
दिल का होना बहाल मुश्किल है
हो न अपना ख़याल मुमकिन है
हो न उन का ख़याल मुश्किल है
आ गई जो उरूज पे इक बार
फिर अना का ज़वाल मुश्किल है
लाख कोशिश करूँ मगर मिलनी
मीर की अब मिसाल मुश्किल है
#अमित_अब्र
कर गया हिज्र फ़ासला इतना
दिल-ए-नादाँ विसाल मुश्किल है