अंदाज़-ए-ख़िज़ाँ देख के मायूस फ़ज़ा है
मायूस शजर और असीरी में सबा है
मग़रूर हुआ ज़ुल्म तो मजबूर बढ़े हैं
हालात-ए-जहाँ देख के मायूस ख़ुदा है
वाक़िफ़ है गुनहगार गुनाहों की सज़ा से
किरदार मगर बन के वो पर्दे में छिपा है
तक़रीर-ए-सितमगर में बहुत ज़िक्र है किस का
शमशीर हुई सुर्ख़, लहू किस का बहा है
कुछ अहल-ए-वफ़ा याँ गुल-ए-उल्फ़त जो खिलाये
सो आप जफ़ा आज यहाँ ख़ुद से ख़फ़ा है
क़िस्सा दिल-ए-मुज़्तर का असरदार रहा था
कोहराम यहाँ इक सर-ए-बाज़ार उठा है
अब ख़्वाहिश-ए-उल्फ़त दिल-ए-मजरूह करे क्यूँ
है हाल-ए-मुहब्बत वो कि मा'ज़ूर वफ़ा है
#अमित_अब्र
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