बाद बिछड़ने के उन से सावन की रुत आई है
बरस रही है ख़ामोशी भीग रही तन्हाई है
जाते-जाते रुक जाती है जान जिगर से क्यूँ मेरी
क्यूँ क़ैद-ए-मुहब्बत से मुझ को मिलती नहीं रिहाई है
याद तुम्हारी हर दम आई कभी न लेकिन तुम आये
शेर-ओ-ग़ज़ल ग़मगीन हुए ग़मगीं हुई रुबाई है
इश्क़ की ख़ातिर इंसाफ़ की बातें करना है बेकार
फ़रियाद-ए-बिस्मिल-ए-उल्फ़त की याँ न कहीं सुनवाई है
जी होता है रंजीदा जब देखूँ तस्वीर तुम्हारी
कर के याद पुरानी बातें आँख मिरी भर आई है
इश्क़ की ख़ातिर सहरा-सहरा भटके जो दीवाने
दुनिया उन दीवानों को अब तक भूल न पाई है
गुज़िश्तगान-ए-मुहब्बत बतलाये ये राज़-ए-मुहब्बत
उल्फ़त में दीवानों को मिलती अक्सर रुस्वाई है
एक शहर में पोशीदा देखे दो-दो मंज़र आज
ख़ामोशी है कहीं कहीं पे गूँज रही शहनाई है
तन्हा रहने की आदत डालो ख़ातिर जीने की
हर शाम तुम्हारी तुम से दूर हुई परछाई है
देखूँ जब इस दुनिया को खेल ख़ुदा का समझ न आये
सच्चे बिखरे-बिखरे हैं झूटों में यकजाई है
सच को सच साबित करने में लगता एक ज़माना
पर झूट शुरू से जाने है होती जो सच्चाई है
#अमित_अब्र
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