बाद तुम्हारे मेरी कहानी
प्यासा सहरा और वीरानी
उल्फ़त की है यही निशानी
माँगें तुम से हर क़ुर्बानी
उन बिन बस है ग़म और अज़ाब
उन बिन है ग़मगीन जवानी
रक़ीब हुआ है मुंसिफ़ सो अब
उल्फ़त चाहत सब बे-मा'नी
भँवर में आई कश्ती मेरी
दरिया ने जब की मनमानी
है मंज़िल राह-ए-मुहब्बत की
ऊँचा कोह* या गहरा पानी
*पर्वत
उल्फ़त को तुम सहल न जानो
एक सफ़र ये रेगिस्तानी
#अमित_अब्र
22 22 22 22
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