घर क्या है तेरे आने के बाद
इक शादाबी वीराने के बाद
माँगा उस रब से फिर हम ने कुछ न
तेरे दिल में आ जाने के बाद
अफ़साने बाक़ी सब हैं बेकार
तेरे मेरे अफ़साने के बाद
होता है रौशन दुनिया में इश्क़
दीवार-ए-नफ़रत ढाने के बाद
ख़्वाहिश इस दिल को किस का हो आज
बाक़ी क्या तुम को पाने के बाद
क्या बच जायेगा फिर मेरे पास
इस घर से तेरे जाने के बाद
रह जाऊँगा बस इक मैं ही साथ
तेरे सारे याराने के बाद
इक मदहोशी फिर छाई महफ़िल पे
उस नाज़ुक के इतराने के बाद
ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-दिल निकला इश्क़
दिल ख़ुश है सौ ग़म खाने के बाद
उल्फ़त को झुकना है ना-मंज़़ूर
परचम अपना लहराने के बाद
नश्शे सारे दुनिया के बेकार
नश्शा-ए-रिज़्क़-ओ-दाने के बाद
ग़मगीं दिल तब ज़्यादा रोया, जब थे
अपने आये बेगाने के बाद
बुलबुल सुन तेरी जाएगी जान
गाने उल्फ़त के गाने के बाद
मिलता है साहिल अक्सर दरिया के
हर तूफ़ाँ से टकराने के बाद
उल्फ़त ख़ातिर फिर लड़ने ज़ुल्मत से
जुग्नू आये दीवाने के बाद
ख़ुश हो बिन मेरे जब तुम कहती हो
आती है मौत इस ताने के बाद
बिन उस के घर मेरा था ग़मगीन
ग़मगीं हम थे काशाने* के बाद
*घर
वापस आया फिर मय-ख़ाने से कौन
इन रिन्दों के बहकाने के बाद
पत्थर किस ने काटा फिर बे-ख़ौफ़
शीरीं के उस दीवाने के बाद
लगती जी में जब उल्फ़त की आग
शम्मा जलती परवाने के बाद
तुर्बत में मेरी, तेरी यादों के
तहखाने थे तहखाने के बाद
जब भी की हम ने काबे की बात
है बुत छूटा बुतखाने के बाद
जाने क्यूँ ग़ाफ़िल है दिलबर मुझ से
उलझन सारी सुलझाने के बाद
यारी मय-ख़ाने से इतनी की, कि
भूले सब कुछ पैमाने के बाद
कैसी है ये कर्ज़े की फ़ेहरिस्त
बच जाता कुछ हर्जाने के बाद
ग़मगीं का ग़म तब होगा महसूस
इक ग़मगीं को घर लाने के बाद
कुछ रिश्ता था उस अंजाने से, जो
दम निकला उस अंजाने के बाद
#अमित_अब्र
222 222 2221
No comments:
Post a Comment