फ़ज़ा हुई फ़रेबी सो हैं शजर हुए मजबूर
दहशत में फूलों की अस्मत शाख़ें हैं रंजूर*
*ग़मगीन
बढ़ते जाये है ग़म ग़मगीनों की बस्ती का
शमशीर-ए-सितमगर होती जाये है मग़रूर
दुनिया ज़िन्दा लाश हुई है आगे क़ातिल के
किस से जा कर माँगे अब इमदाद यहाँ मा'ज़ूर*
*असहाय
तारीकी* ने सर^ पाई है आज उजाले पे
अँधियारे का राज हुआ ख़ुर्शीद° हुआ बे-नूर
*अँधेरे
^जीत
°सूरज
ज़ुल्म-ओ-सितम पे इक ख़ामोशी चारों जानिब है
ऐ दुनिया क्या जी को तेरे जब्र* हुआ मंज़ूर
*ज़ुल्म
इक आबाद शहर वीरान हुआ गुमनाम हुआ
वीराँ करने वाला हो गया आबाद-ओ-मशहूर
आबाद-ओ-आज़ाद बचे वो जो थे अपने घर में
असीर* हुआ वो शाहीं था जो था दर से अपने दूर
*क़ैद
अपना हाल-ए-दिल है हाल-ए-दिल-ए-मजबूर सा
टूटा जब जब मजबूर टूटा तब तब मेरा ग़ुरूर
अपना ग़म अपने आँसू पी जाऊँ फिर भी
हमसाया है ग़मगीनी में कैसे होऊँ मसरूर*
*प्रसन्न
साये की तरह जब भूख लगी हो पीछे पीछे
बहता पसीना पेशानी* से कब पोंछे मज़दूर
*माथा
साया-ए-बला में वहशी जब जब इंसान हुआ
बुझ गये ज़ुल्म-ए-आसेब* में लाखों आँगन के नूर
*राक्षस का ज़ुल्म
#अमित_अब्र
22 22 22 22 22 22 2=26
22 22 22 22 22 22 21=27
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