Saturday, 14 December 2019

फ़ज़ा हुई फ़रेबी सो हैं शजर हुए मजबूर

फ़ज़ा हुई फ़रेबी सो हैं शजर हुए मजबूर 
दहशत में फूलों की अस्मत शाख़ें हैं रंजूर*
*ग़मगीन  

बढ़ते जाये है ग़म ग़मगीनों की बस्ती का
शमशीर-ए-सितमगर होती जाये है मग़रूर 

दुनिया ज़िन्दा लाश हुई है आगे क़ातिल के 
किस से जा कर माँगे अब इमदाद यहाँ मा'ज़ूर*
*असहाय 

तारीकी* ने सर^ पाई है आज उजाले पे
अँधियारे का राज हुआ ख़ुर्शीद° हुआ बे-नूर 
*अँधेरे 
^जीत
°सूरज 

ज़ुल्म-ओ-सितम पे इक ख़ामोशी चारों जानिब है 
ऐ दुनिया क्या जी को तेरे जब्र* हुआ मंज़ूर 
*ज़ुल्म 

इक आबाद शहर वीरान हुआ गुमनाम हुआ 
वीराँ करने वाला हो गया आबाद-ओ-मशहूर

आबाद-ओ-आज़ाद बचे वो जो थे अपने घर में
असीर* हुआ वो शाहीं था जो था दर से अपने दूर 
*क़ैद 

अपना हाल-ए-दिल है हाल-ए-दिल-ए-मजबूर सा
टूटा जब जब मजबूर टूटा तब तब मेरा ग़ुरूर 

अपना ग़म अपने आँसू पी जाऊँ फिर भी 
हमसाया है ग़मगीनी में कैसे होऊँ मसरूर*
*प्रसन्न 

साये की तरह जब भूख लगी हो पीछे पीछे 
बहता पसीना पेशानी* से कब पोंछे मज़दूर 
*माथा

साया-ए-बला में वहशी जब जब इंसान हुआ  
बुझ गये ज़ुल्म-ए-आसेब* में लाखों आँगन के नूर
*राक्षस का ज़ुल्म



#अमित_अब्र

22    22   22   22   22   22   2=26
22    22   22   22   22   22   21=27

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