आज शहर की हम ने अपने जलती देखी तस्वीर
नाम-ए-सियासत और मजहब में जल गई उस की तक़दीर
तलवार नहीं है कहीं पे लेकिन शहर सना है लहू में अपने
क्या तक़रीर ख़िलाफ़-ए-हुकूमत ही आज हुई शमशीर
सच आ जाये न सामने सब के सो आज हुकूमत ने
ताले डाले होंटों पर, डाली पैरों में ज़ंजीर
कोशिश ऐसी की कि हो जाती हक़ीक़त दुनिया सपनों की
सियासी आग में लेकिन जल गई मेरे ख़्वाबों की ताबीर
ज़ुल्म-ओ-जब्र-ओ-जफ़ा में गर जो मज़दूर हुआ मा'जूर*
कैसे होगी शहर में कोई नई इमारत फिर ता'मीर
*असहाय
किस को सुनाऊँ अपना ग़म, कैसे बताऊँ जी का हाल
रंजीदा हूँ कितना मैं देख सितमगर की ताज़ीर*
*punishment
आज मुहब्बत दिलबर की हो गई नफ़रत में तब्दील
कैसे सहे अब ज़ुल्म-ए-जुदाई, दिल का मारा ये दिल-गीर*
*ग़मगीन
#अमित_अब्र
22 22 22 22 22 22 221=29
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