क़ैद-ए-बे-हुनर से कब आज़ाद हुनरमंद हुए
हो कर हुनरमंद कब आबाद हुनरमंद हुए
कभी न उन को रास आई दुनिया उल्फ़त की
इश्क़ में पड़ अक्सर बरबाद हुनरमंद हुए
सरमाये की हुकूमत से ना-शाद हुनर है
सरमाये से न कभी शाद हुनरमंद हुए
पड़ी ज़रूरत जब जारी उन की ख़ोज हुई
बे-सबब कहाँ किसी को याद हुनरमंद हुए
उन को भूले हम जिन का काम, काम आया
रुस्वा-ए-हुनर से ना-शाद हुनरमंद हुए
क़ैद-ए-ताइर ख़ातिर बदले सारे पैंतरे
सीख नये हुनर अब सय्याद हुनरमंद हुए
जब भी यहाँ फ़साद हुए दुनिया ये तक्सीम हुई
तोड़ने में राब्ता फ़साद हुनरमंद हुए
खिला न पाये हम उल्फ़त का गुल एक यहाँ
इतना नफ़रतों के उस्ताद हुनरमंद हुए
दर्द ख़रीदे है हुकूमत, वास्ते हुकूमत के
हैं आज सियासी इमदाद हुनरमंद हुए
आख़िर फ़रियाद ने दिलाई क़ैद से रिहाई
आख़िर में हासिल-ए-फ़रियाद हुनरमंद हुए
बचाने में निशानी आज ज़मीदोज़ मकाँ की
अक्सर हैं संग-ए-बुनियाद हुनरमंद हुए
फिर भी सँभाल लेते हैं ख़ुद को फ़िराक़ में वो
पीने में अश्क़ दिल-ए-नाशाद हुनरमंद हुए
#अमित_अब्र
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