हमारे नाम पर होना अभी कोहराम बाक़ी है
ज़माने में हमें होना अभी बदनाम बाक़ी है
ख़ता जो की नहीं हम ने कभी भी भूल कर यारों
हमारे नाम पर लगना वही इल्ज़ाम बाक़ी है
वफ़ा मक़्दूर तक तो की मगर महरूम है उस से
मुहब्बत के जहाँ में इक दिल-ए-ना-काम बाक़ी है
मुहब्बत की मसाफ़त में मराहिल आज मक़्तल हैं
वफ़ादारी के बदले मौत का ईनाम बाक़ी है
डुबोया शाम ने हर रोज़ सूरज को समंदर में
सितारों तक पहुँचना शाम का पैग़ाम बाक़ी है
बहुत बेज़ार गुज़रे दिन, बहुत बेज़ार गुज़री शब
गुज़रती ज़िन्दगी में ज़िन्दगी की शाम बाक़ी है
मिटाया वक़्त ने मुझ को मगर ज़ाहिर अभी भी हूँ
अभी कुछ और भी शायद मिरा अंजाम बाक़ी है
#अमित_अब्र
1222 1222 1222 1222
______________________________________
मक़्दूर=सामर्थ्य, शक्ति,
मराहिल=मंज़िलें,
मक़तल=जहाँ फाँसी दी जाती है,
बेज़ार=नाराज़,
शब=रात,
No comments:
Post a Comment