क़दम दर क़दम है क़यामत फ़ज़ा में
बला इक घुली है हवा बन हवा में
नज़र भी कहीं क़ातिल आता नहीं है
जहाँ जल रहा आज कैसी जफ़ा में
बला कर रही है ज़माने को ख़ंडर
शहर हो गया है बयाबाँ बला में
तबाही है यूँ कि पता भी नहीं है
न जाने गई जान कितनी वबा में
जो ग़ाफ़िल हो उस से तो है मौत निश्चित
बला का है अंदाज़ उस की अदा में
ख़ुदा बेख़बर या कि भगवान् रूठा
असर क्यूँ न आया वबा की शिफ़ा में
बने जान पर तो कर अपनी हिफ़ाज़त
उलझ मत सियासत के तू मुद्दआ में
अगर साँस लूँ तो रही रुक ये धड़कन
घुली मौत है आज मानो सबा में
हैं दर बन्द सारे हुए क्यूँ ख़ुदा के
असर अब न बाक़ी रहा क्या दुआ में
न हो ठीक घर आज लौटे अगरचे
कसर इक न छोड़ी इलाज-ओ-दवा में
मुहब्बत भी बीमार पे बेअसर है
कमी रह गई कोई शायद वफ़ा में
हुई पस्त चारागरी आज मेरी
बला ऐसी गर्दिश करे है फ़ज़ा में
जो है वक़्त-ए-मुश्किल तो कर तू यक़ीं फिर
शिफ़ा में दवा में दुआ में ख़ुदा में
#अमित_अब्र
122 122 122 122
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