दिलबर की याद में बे-चैन मेरा दिल है
सज़ा-ए-उल्फ़त है या वफ़ा का हासिल है
डूबे तो ठीक थे, निकले तो जल उठे हैं
दरिया-ए-इश्क़ का आतिश-मिज़ाज साहिल है
उल्फ़त की दास्ताँ सुन आया यक़ीन ये
राह-ए-मुहब्बत दिलबर बग़ैर मुश्किल है
नज़र-अंदाज़ हुआ जो निगाह-ए-यार से, तो
दुुनिया ही नहीं, दिल आप से भी ग़ाफ़िल है
मुजरिम बता दिया है क्या यार ने मुझे
जो नाम पे मेरे बे-ज़ुबान महफ़िल है
सहरा से जो गुज़रे तो ख़याल-ए-क़ैस आया
उस दिल-ए-बिस्मिल का दिल आज भी क़ाइल है
बरसों रहा सफ़र में कौन उस की ख़ातिर
मिलने को आज उस से बे-क़रार मंज़िल है
#अमित_अब्र
22 22 22 22 22 2=22
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