कर के रुस्वा मुझ को, वो भी पछताया होगा
छुप कर ही सही, जनाज़े में मिरे आया होगा
आया होगा ज़िक्र मिरा, जब ज़िक्र-ए-मुहब्बत में
हाल-ए-दिल अपना वो, ब-मुश्किल सब से छुपाया होगा
दूर हुए जो दस्तूर-ए-दुनिया की ब-दौलत हम
फिर नींद न आई हम को, वो भी न सो पाया होगा
हो के ग़ैर का तस्वीर हमारी जलायी होगी
यादों से मगर अपनी हम को न भुलाया होगा
ख़्वाब तो आते होंगे मेरे अक्सर उस को
ताबीरों ने भी पता मेरा उस को बताया होगा
अर्ज़-ए-दुनिया पे मुहब्बत के लिए, वो हिज्र में भी
दर्द भरे दिल से, गीत उल्फ़त के गाया होगा
गुज़र गया होगा दर्द-ए-दिल, जब हद से अपने
फिर दिल, हाल-ए-दिल पे अपने मुस्काया होगा
#अमित_अब्र
22 22 22 22 22 22 2 =26
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