रौशन हुआ फ़लक तो महकी हुई ज़मीं है
मज़दूर ही के दम से दुनिया हुई हसीं है
तब्दील कर रहा जो ज़ुल्मत को रौशनी में
क़िस्मत उसी की देखो रौशन हुई नहीं है
हँसते मकान सारे मज़दूर की बदौलत
मज़दूर की बदौलत मसरूर हर मकीं है
जलते हैं घर में चूल्हे रोटी तभी है पकती
जलती है जब कहीं पे मज़दूर की जबीं है
हर हाल हाल अपना रखता निहाँ वो सब से
किस बात की खुशी है किस बात की ग़मीं है
वादा किया अगर तो पूरा भी वो करेगा
मेहनत-कशी पे उस की पूरा मुझे यक़ीं है
एहसास-ए-कमतरी क्यूँ मायूस को कराते
बँध कर न एक दर से कमियाँ सदा रहीं हैं
मरती है ख़ूबसूरत पे याँ तमाम दुनिया
जो है न ख़ूबसूरत वो किस का दिल-नशीं है
मज़दूर भी बनेगा इक दिन यहाँ पे मालिक
ईमान-ओ-सब्र का फल मिलता सदा यहीं है
सुन दास्तान उस की रोता जिगर है मेरा
परिवार है कहीं तो मज़दूर ख़ुद कहीं है
मज़दूर चलते चलते आ कर रुका जहाँ पे
तक़दीर-ए-मुल्क भी फिर आ कर रुकी वहीं है
#अमित_अब्र
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