मिसाल-ए-जमाल इक यहाँ रह रहा है
मकाँ ज़ब्त का अब मिरा ढह रहा है
लबों से टपकते हैं अशआ'र उस के
हँसे भी तो मानो ग़ज़ल कह रहा है
रवानी अदाओं में लहरों के जैसी
चले वो तो मानो बहर बह रहा है
हसीं यार की हर अदा में उलझ कर
गहे दिल गहे जाँ जिगर गह रहा है
हुए क़ातिलाना जो अंदाज़ उस के
सितम जाने कितने ये दिल सह रहा है
#अमित_अब्र
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