हर ओर अब सफ़र इक आसेब कर रहा है
दुनिया सहम रही है इंसान डर रहा है
ख़ामोश आस्माँ तो, सहमी सी है ज़मीं ये
इक हश्र देख घर-घर, घर आज कर रहा है
ऐसा क़हर है बरपा धरती पे आस्माँ से
जिस सम्त देखिये सन्नाटा पसर रहा है
बेख़ौफ़ है बला या है वक़्त आज बेबस
आसेब जी रहा तो इंसान मर रहा है
वीरानगी शहर में छाई वबा के चलते
सुनसान एक मेरे दीवार-ओ-दर रहा है
ज़ुल्मत उरूज पर तो सूरज ज़वाल पर अब
बिन रौशनी के अब जी सारा शहर रहा है
क्या ख़ूब वक़्त ने याँ बदली है आज करवट
बे-ख़ौफ़ हैं परिन्दें, सय्याद डर रहा है
चुपचाप मौत आई जो राह-ए-ज़िन्दगी में
धड़कन सिमट रही डर ज़ेहन में भर रहा है
क्या शाम क्या सहर क्या दिन रात दोपहर अब
ज़ुल्म-ए-वबा में सन्नाटा हर पहर रहा है
सूने पड़े शहर हैं तूफ़ान में बला के
उजड़ा हुआ चमन तो वीराँ शजर रहा है
नाकाम हर शिफ़ा है बीमार पे उदासी
मायूस हैं मरासिम ग़मगीन घर रहा है
नाकाम हर शिफ़ा तो बीमार पे उदासी
मायूस हैं मरासिम हो यास घर रहा है
चारागरों की कोशिश बेकार हो रही है
ख़ूँ-ख़ार वार हम पे आसेब कर रहा है
#अमित_अब्र
221 2122 221 2122
No comments:
Post a Comment