Monday, 10 February 2020

रंग-ए-शफ़क़ वो, वो शाम का आफ़ताब लगता है

रंग-ए-शफ़क़ वो, वो शाम का आफ़ताब लगता है
सितारों भरी रात में खिला माहताब लगता है 

रंग-ए-शफ़क़ = शाम की लालिमा का रंग
आफ़ताब =सूरज 
माहताब =चाँद


दुनिया के गुलशन में वो भरता है रंग इस क़दर
कभी मुसव्विर-ए-जहाँ, कभी सुर्ख़ाब लगता है

मुसव्विर-ए-जहाँ =painter of world
सुर्ख़ाब = a colorful bird


जुल्फ़ घटा तो झील आँखें हैं रुख़्सार गुलाबी
अदाओं से तो अपनी वो लाजवाब लगता है

रुख़्सार = cheek


पाकर एक नज़र उस की इश्क़ डूब है जाता
दरिया-ए-इश्क़ में वो हुस्न का गिर्दाब लगता है 

गिर्दाब = भँवर


यूँ तो हसीं बहुत हैं दुनिया में यारों लेकिन 
यार हमारा आप हसीनों का ख़्वाब लगता है

पड़ते हैं अंजुमन में जब जब हसीं क़दम उन के
मंज़र-ए-महफ़िल तब तब दिलकश-ओ-नायाब लगता है 

अंजुमन =महफ़िल 
नायाब = rare


तस्वीर-ए-यार देखूँ जो सुर्ख़ जोड़े में तो फिर 
दिल-ए-नादाँ बे-बस-ओ-बे-क़रार-ओ-बे-ताब लगता है 


#अमित_अब्र

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