मुहब्बत में दिल ग़म-ज़दा हो रहा है
मिरा यार मुझ से जुदा हो रहा है
सज़ा-ए-मुहब्बत हुई फिर मुक़र्रर
यही काम याँ तयशुदा हो रहा है
तमन्ना-ए-उल्फ़त उठे दिल में कैसे
सनम ही मिरा जब ख़फ़ा हो रहा है
अब उस से मुलाक़ात मुमकिन हो कैसे
मुहब्बत में जब वो ख़ुदा हो रहा है
नुमायाँ भले हूँ ज़माने को लेकिन
दिल उल्फ़त में अब गुम-शुदा हो रहा है
मुझे देख कर भी नहीं देखता जो
वही शख़्स याँ क्यूँ मिरा हो रहा है
मुक़द्दर में था या ख़ता कुछ हुई थी
ग़म उल्फ़त की क्यूँ इब़्तिदा हो रहा है
जिसे तू नहीं जानता है मिरे दिल
बता क्यूँ उसी पे फ़िदा हो रहा है
मिटा हूँ मुहब्बत में सो नाम मेरा
जहाँ में मिसाल-ए-वफ़ा हो रहा है
#अमित_अब्र
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