याद में उन की जी का मेरे, देखो काम तमाम हुआ
सौ ज़ख़्म दिये इस उल्फ़त ने, इक ग़म आख़िर ईनाम हुआ
तुम क्या जानो तासीर-ए-मुहब्बत, तुम क्या जानो मुहब्बत
कल तक जो ज़ाहिर था बहुत, वो इश्क़ में पड़ गुमनाम हुआ
दुनिया ने उस को छोड़ा, जिस ने ली याँ राह-ए-मुहब्बत
दिल के मारों का नाम यहाँ, जाने क्यूँ बदनाम हुआ
शहीद-ए-उल्फ़त क्या क्या न सहे याँ इल्ज़ाम-ए-उल्फ़त में
लैला तड़पी महलों में, सहरा मजनूँ के नाम हुआ
हाथ से मेरे प्यार गया, सरमाये की जो बात हुई
ये दिल मेरा अनमोल था अब तक, अब था बे-दाम हुआ
नफ़रत से सब को प्यार हुआ, चारों जानिब नफ़रत है
नफ़रत के आगे भी लेकिन प्यार कहाँ नाकाम हुआ
ज़ेहन पे छाई एक ख़मोशी, दिल में था इक शोर उठा
कैसी थी ये दुनिया प्यारी, कैसा इसका अंजाम हुआ
#अमित_अब्र
22 22 22 22 22 22 22 2=30
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